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“कब मिलेगी आज़ादी?” LYRIC BY:RONNIE TANTI 😌

male vocals, hip-hop metalic,rap,fast electric guitar

RONNIETANTI😎·5:52

Lyrics

“कब मिलेगी आज़ादी”

"WHEN WILL WE GET FREEDOM"

LYRIC BY:RONNIE TANTI 😌

Intro

क्यों…?

कितनी सदियों से क्यों…?

असम की मिट्टी रोती है,

पर आवाज़ कोई नहीं सुनता।

आदिवासी भाई–बहन…

तुम्हारा दर्द अब हम चुप नहीं रहने देंगे।

ये गाना नहीं—ये हक़ की चीख है।

Verse 1

असम के आदिवासी रो रहे हैं, पर दुनिया आँखें मोड़ लेती,

जिस दर्द में सांसें टूटती हैं, उस दर्द को दुनिया छोड़ देती।

किसने कहा कि इंसान नहीं? किसने कहा कि हक नहीं?

उनकी हथेलियों के पसीने से ही तो चलती है ये चाय की धरती।

पर सरकार? बस चुनाव में याद करती है उन्हें,

वोट बैंक का मोहरा समझती है, इज़्ज़त नहीं देती है उन्हें।

आज पूछ रहा हूँ—क्यों? जवाब दो, ऐ शासन वालों,

आजाद मुल्क में भी गुलामी झेलें? कैसे बोलोगे खुद को नेताओं?

Hook Chorus

कब मिलेगी आज़ादी—आदिवासियों को असल वाली?

क्यों अब भी जंजीरें हाथों में और गुस्सा आँखों में डाला?

अधिकार की चीख हवा में उड़कर वापस गूंजती आती—

सरकार जवाब दे… कब मिलेगी आज़ादी?

Verse 2

मीडिया खामोश क्यों है?

कैमरा घूमता है पर उनके गाँव तक पहुँचता ही नहीं।

अख़बार में खबरें बनती हैं, पर

उनकी गिरी हुई झोपड़ी पर कोई पन्ना छपता ही नहीं।

आदिवासी इंसान नहीं क्या?

उनका लहू लाल नहीं क्या?

उनकी आँखों में सपने मरते हैं,

कोई पूछने वाला आसपास नहीं क्या?

जमीन के कागज़ात छीन लिए—क्यों?

उनकी धरती पर ही उनका नाम काट दिया—क्यों?

जन्म से वहीं, सांस से वहीं,

पर पहचान से बाहर कर दिया—क्यों?

Bridge

सुन लो, ये दर्द कोई कहानी नहीं,

ये चीख जली हुई जवानी नहीं,

ये सवाल सदियों से जिंदा है—

कब तक हक़ अधूरा और सत्ता बहरी?

Hook

कब मिलेगी आज़ादी—आदिवासियों को असल वाली?

क्यों अब भी जंजीरें हाथों में और गुस्सा आँखों में डाला?

अधिकार की चीख हवा में उड़कर वापस गूंजती आती—

सरकार जवाब दे… कब मिलेगी आज़ादी?

Verse 3

वोट दो… वोट दो… बोलते हो—“भविष्य सुधरेगा!”

पर जैसे ही वोट पड़े—सरकारी वादा मुंह मोड़ लेता है।

विकास के सपने बेचे जाते, पर जमीनी हक़ छीने जाते,

आदिवासियों के गाँव, सड़क, पानी—सब पीछे रह जाते।

सरकारें आईं–गईं, पर तकदीर वैसे की वैसी,

गुलामी भी बदली नहीं, आँसू वही–वही, चुप्पी जैसी।

वो भोले हैं, पर टूटे नहीं—इंसान हैं, पर झुके नहीं,

दिल उनका लोहे का है,

पर फिर भी क्यों सुने नहीं गए?

बच्चे स्कूल से दूर,

माएँ अस्पताल से दूर,

बुज़ुर्ग दवा से दूर,

और नेता वादों से भरपूर!

Verse 4

देश आज़ाद हुआ 1947 में…

पर इनकी आज़ादी आज तक रास्ता ढूंढ़ रही है।

आदिवासी आज भी पूछते हैं—

“हमारा दिन कब आएगा?”

“हमारी आवाज़ कब सुनोगे?”

“हमारी जमीन कब लौटाओगे?”

ये सवाल बस सवाल नहीं,

ये पीढ़ियों का दर्द है।

उनकी रूह कहती है—

हमें दया नहीं—हक चाहिए।

Metal Breakdown

हक चाहिए!

हक चाहिए!

हक चाहिए अभी!!

Verse 5

नेता मंच पर कहते—"विकास करेंगे!"

पर सच में किसका करते हैं?

जो बस्ता उठाकर स्कूल जाना चाहता था,

वो आज टोकरी उठाकर चाय बागान में पत्ता तोड़ता है।

ये कैसा न्याय? ये कैसी नीति?

ये कैसी आँखें जिनमें इंसानियत ही नहीं दिखती?

सरकार कहती—“सुनेंगे।”

पर कब?

कब तक इंतज़ार करे आदिवासी क़ौम अपनी इज़्ज़त का?

उनकी लड़ाई अकेली नहीं है—

ये मुल्क की भी शर्म है।

हमारे बीच इंसान दर्द से गुज़र रहा है—

और हम स्क्रॉल करके आगे बढ़ रहे?

Final Hook

कब मिलेगी आज़ादी—आदिवासियों को असल वाली?

कागज़ लौटाओ, हक लौटाओ, उनका मौजूद होना मत भूला!

अधिकार का सूरज उगे—यही है उनकी पुकार भारी—

सरकार जवाब दे… कब मिलेगी आज़ादी?

Outro

ये गीत नहीं…

ये चीख है।

ये आदिवासी आवाज़ है।

अब नज़रअंदाज़ नहीं होगी।

जब तक हक़ नहीं मिलता—

ये आवाज़…

गूंज…

गूंज…

गूंजती रहेगी।

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